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Vijaya Dashmi Greetings
बुराई का अंत आवश्यक है, पर अच्छाई का अंत क्यों हो?
राम ने लक्ष्मण से कहा था, जाओ, रावण के पास जाओ, वह जा रहा है, पर उसके साथ उसका ज्ञान न जाने पाए।
क्योंकि प्रभु व्यक्ति के दोष में भी उसके गुण को पहचानते हैं।
बुराई का अंत आवश्यक है, पर अच्छाई का अंत क्यों हो? अहंकार जले, ज्ञान बचा रहे, रावण मिटे, विद्वता बची रहे।
शायद यही राम होने का अर्थ है, जो बुरा है, उसका विसर्जन, जो श्रेष्ठ है, उसका संरक्षण।
नौ दिन हमने मन के आँगन को साफ़ किया, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर और अहंकार को देखा।
और दसवाँ दिन आया पूर्णाहुति लेकर।
पर क्या विजयादशमी वर्ष में केवल एक बार आती है?
कहते हैं, मनुष्य एक दिन में लगभग 21,600 बार साँस लेता है।
तो प्रभु ने हमें एक विजयादशमी नहीं, हर दिन हज़ारों अवसर दिए हैं।
हर आती साँस जीवन का प्रसाद, हर जाती साँस एक छोटी-सी पूर्णाहुति।
और इन दोनों के बीच वह सूक्ष्म-सा विराम...
जहाँ न पिछली साँस अपनी है, न अगली साँस का भरोसा।
बस वही क्षण तुम्हारा है।
वहीं रुककर अपने भीतर के शिव को समर्पित हो जाओ, अपने भीतर के हरि को पहचान लो, अपने भीतर बैठे राम को प्रणाम कर लो।
क्योंकि अगली साँस हमारे अधिकार में नहीं।
फिर वर्षों का इंतज़ार क्यों?
अगला दशहरा क्यों?
अगला शुभ मुहूर्त क्यों?
जो जलाना है, अभी जला दो। जो बचाना है, अभी बचा लो। जो छोड़ना है, अभी छोड़ दो। जो प्रभु को सौंपना है, अभी सौंप दो।
और जब रास्ता समझ न आए, हनुमान की नीति याद रखना—
“तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेश्वर भए सब जग जाना।”
हनुमान ने विभीषण को सिर्फ़ राज्य पाने की युक्ति नहीं दी थी, राम की शरण का मार्ग दिखाया था।
क्योंकि जब भीतर राम दिखने लगें, तो कर्म बदल जाता है।
फिर काम अपने लिए नहीं होता, कर्तव्य बन जाता है।
सफलता अहंकार नहीं बनती, प्रसाद बन जाती है।
और जो मिलता है, उसे पकड़ने की बेचैनी नहीं रहती, क्योंकि विश्वास होता है कि जो मेरे योग्य है, प्रभु उसे मेरे कर्मों के माध्यम से मुझ तक पहुँचा देंगे।
यही शायद विजयादशमी है।
रावण को केवल बाहर मत जलाओ, उसका ज्ञान बचा लो।
अपने भीतर भी क्रोध जला दो, साहस बचा लो। अहंकार जला दो, आत्मसम्मान बचा लो। लोभ जला दो, पुरुषार्थ बचा लो। मोह जला दो, प्रेम बचा लो। ईर्ष्या जला दो, प्रेरणा बचा लो। “मैं” जला दो, और भीतर का “राम” बचा लो।
विजय का अर्थ किसी और को हराना नहीं, अपने भीतर के निकृष्ट को मिटाकर अपने भीतर के श्रेष्ठ को बचाना है।
नौ दिन शुद्धि, दसवाँ दिन पूर्णाहुति।
लेकिन जीवन कहता है—
इतना इंतज़ार भी क्यों?
हर साँस नवरात्रि हो सकती है, हर विराम समर्पण, हर अगली साँस विजयादशमी।
आज तुम्हें फिर अवसर मिला है।
अभी।
यहीं।
इसी साँस में।
आँखें बंद करो, भीतर राम को देखो, और धीरे से कहो—
हे प्रभु, जो मुझमें रावण है, उसे जला देना, जो मुझमें राम का है, उसे बचा लेना।
फिर साँस छोड़ दो...
क्योंकि शायद विजयादशमी कोई तारीख़ नहीं, दो साँसों के बीच लिया गया एक सही निर्णय है।